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शरीर में कैल्शियम की कमी से होनेवाला जोइन्ट पेइन और अन्य बीमारी

हमारे लूक और शारीरिक सुद्रढ़ता हड्डीयों की वजह से होती हैं। हड्डी कमजोर हुई तो शरीर भी कमजोर होने लगता हैं। थोड़ी सी ठोकर लगने से फेक्चर हो जाता हैं, जिसके जोइन्ट होने में काफी लंबा समय लगता हैं। रोगी की परेशानियां बढ़ जाती हैं हड्डियां कमजोर होने से यह रोग ओस्टीयोपोरोसीत के नाम से जाना जाता हैं।
ओस्टीओ पोरोसीन होने का मुख्य कारण कैल्शियम की कमी हैं। क्योंकि हड्डियों की मुख्य संरचना कैल्शियम है। हमें रोज का 1200 से 1500 एमजी कैल्श्यिम की जरुरत है। यह दैनिक आहार में दूध और दूध के उत्पादों से पर्याप्त मात्रा में मिल जाती हैं। आहार में निहित कैल्शियम का शोषण शरीर में योग्य रूप से होता है। इसके लिए विटामीन डी और योग्य कसरत भी काफी फायदेमंद हैं। इसमें से किसी भी चीज की जरूरत पूरी न हो तो शरीर में कैल्शियम की जरूरत हड्डी का कैल्शियम लेकर पूरा करती हैं जिससे हड्डियां पोली और कमजोर बनती हैं। महिलाओं में यह रोग विशेष प्रमाण में देखने को मिलता हैं। पहले तो बड़ी उम्र की महिलाएं मोनोपोज के बाद यह समस्या उत्पन्न होती हैं। क्योंकि महिला के हारमोन एस्ट्रोजन हड्डी को मजबूत और सख्त बनाने का कार्य करता हैं। मोनोपोज के बाद इसका वजन कम होने से हड्डी कमजोर होने लगती है। आज के मौजूदा युग में तो 18 से 25 साल की युवतियां भी इस रोग का शिकार होने लगी हैं। शरीर को स्लीम बनाने और वजन कम करने की इच्छा इतनी बढ़ गई हैं कि खाना-पीना छोड़कर डायेटिंग कर वजन कम करने का प्रयोग करती हैं। कसरत का महिलाओं में अभाव रहता हैं। इससे चरबी तो कम हो भी साथ ही कैल्शियम का महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं लेकिन दूधपीना आजकल किसी को पसंद नहीं। जिसके कारण हड्डी कमजोर हो जाती हैं और पोली हो जाती हैं। थोड़ा भी जोर पडने से हड्डी टूट सकती हैं और बारबार यह अनुभव करना दु:खद होता हैं।
इस रोग में फेक्चर होने के उपरांत रीड की हड्डी के मनके भी कमजोर बनते हैं और वजन भी घटता जाता हैं। जिसके चलते मरीज टेडा दिखने लगता हैं और कमर दु:खने लगती हैं। मनके के हृास से रीड की हड्डी का फेक्चर आसानी से हो सकता हैं। कोहनी, कंधा अथवा थापा का फेक्चर बार-बार हो सकता हैं। बोनस्केनर द्वारा बोन मीरल डेन्सीटी नापने से इस रोग की जानकारी मिल सकती हैं। इसके अलावा अल्ट्रासाउण्ड सिस्टम से भी हड्डी की स्थिति का पता लगाया जा सकता हैं। आधुनिक विज्ञान में यह रोग हमेशा के लिए माना जाता हैं। इस रोग से बचने दूध और दूध के उत्पाद डेइली आहार में लेवे एकाद दो फल, 200 ग्राम जितना कच्ची हरी सब्जी उगाये गये कठोळ अनाज निश्चित रूप से लेना चाहिए। प्रात:काल में आधे-आधे घंटे में सूर्य की किरण अवश्य ग्रहण करना चाहिए। इस रोग में होम्योपैथी राम बाण इलाज हैं।

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