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सोलंकी कला का उत्कृष्ट उदाहरण गुजरात का वडनगर

एतिहासिक पाश्चभूमिका : ऐतिहासिक एवं पौराणिक उल्लेखों में नगर, आनर्तपुर, आनंदपुर, चमत्कारपुर, वृद्धनगर एवं प्रख्यात चीनी यात्री ह्यु-एन-संग ने अपने सियुकी, नाम के ग्रंथ में जिसका ओ-न-तो-पु-लो के तौर पर उल्लेख मिलता हैं वह आज के वडनगर (20’ 46’’ 72’ 37”) प्राचीनकाल में गुजरात के मालवा, सौराष्ट्र, राजपूताना, दक्षिण इत्यादि प्रदेशों से जुड़ा एक एक महत्व का सांस्कृतिक केन्द्र था। पुरातत्वीय दृष्टि से देखने पर वडनगर के प्राचीन से प्राचीन अवशेष मौर्यकाल के मिलते हैं। इसके अलावा मैत्रक राजायें (ई.स. 470-788) कलचुरी, परमार, शर्मिष्ठा तालाब का दक्षिण और पश्चिम किनारे पर बसावडनगर के चहूंओर सोलंकी राजा कुमारपाल ने (ई.स. 1152)कोट बनवाया था।
गुजरात की शिल्प- स्थापत्य कला के इतिहास में प्राक-सोलंकी और सोलंकी कला के उत्कृष्ट उदाहरण वडनगर एक सीमाचिह्न है, इसमें प्रख्यात तोरण के अलावा शिल्प-स्थापत्यकला की दृष्टि से आमथेर माता और उनके आंगन पर स्थित अन्य मंदिर का महत्वपूर्ण स्थान हैं, जो (मंदिर) राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा सुरक्षित स्मारक हैं।
आमथेर माता और अन्य मंदिरों का परिचय :
वडनगर में आमथेर दरवाजा के पास विशाल प्रकार से आरक्षित आमथेर (अंबाजी) माता का मंदिरसमूह में मध्य में समूह का मुख्य पश्चिमाभिमुख मंदिर गर्भगृह के पृष्ठभाग के पूर्व तरफ के तीन मुख्य प्रवेश द्वारा के पीछे का विष्णु मंदिर सहित कुल पांच मंदिर आए हैं। यह मंदिर समूह प्राक-सोलंकी और सोलंकीकाल के शिल्प-स्थापत्य के महत्व के उदाहरण हैं। जेम्स बर्जेस ने अपनी किताब (आर्कीटेक्च्युरल एन्टीक्युटिस ऑफ नोर्थन गुजरात) में मुख्य मंदिर के प्राचीन समय में किये गये सुधार और विष्णु के दशावतार के शिल्प का आलेखन मिलता हैं।
मंदिर के गर्भगृह की बाह्य दीवारे नासिका सामान्य होने के बावजूद दक्षिण, पूर्व और उत्तर भद्र गवाक्ष में स्थित महिष मर्दिनी पंचग्नितप पार्वती और पार्वती के स्वरूप की प्रतिमाएं अपने वस्त्र-अलंकार और कलाशैली की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
मुख्य मंदिर के गर्भगृह की पीछे की श्रृंखला में विद्यमान तीन मंदिरों में प्रथम मंदिर विष्णु मंदिर हैं। जो गर्भगृह की द्वारशाखा के दशावतार शिल्प तथा भद्रगवाक्षनी, विष्णु के अवतार की प्रतिमा से फलित होता हैं। आयताकार गर्भगृह पर पंचरथ तलमान है। पंचशाख द्वार के रूपस्थंभ विष्णु के दशावतार का शिल्प हैं। ललाटबिंब में गणेशजी हैं। जिनके उपर की पट्टी पर मालधर पर नवग्रहपट्ट और टोप पर ग्रासपट्टी हैं। द्वारशाख के आगे दोनों तरफ स्थित अर्धस्तंभ शिल्पालंकरण की दृष्टि से मंदिर का एक अनोखा आकर्षण अंग हैं जिसमें ग्रासमुख से निष्पन्न घँटा-साकल के नीचे उदगम मंडित गवाक्ष में द्वारपाल का शिल्प हैं। मंदिर के दक्षिण, पूर्व और उत्तर के भद्रगवाक्षो में क्रमश:वराह, त्रिमूर्ति और नृसिंह के शिल्प हैं।
पिछली श्रृंखला के तीन मंदिरों में लंबा चर्तुकर गर्भगृहयुक्त मध्य का यह मंदिर शक्तिमंदिर होने का भद्रगवाक्ष की देवी के विविध स्वरूप की प्रतिमा से पिछली हरोल के तीन मंदिरों में से आयताकार गर्भगृहयुक्त मध्य का यह मंदिर शक्तिमंदिर होने का भद्रगवाक्ष की देवी के विविध स्वरूप की प्रतिमाओं से प्रतित होता हैं। त्रिरथ तलमानयुक्त गर्भगृह के बाह्य वाह्य दीवारे सामान्य हैं। मंदिर गर्भगृह के तीनों तरफ मूर्तियों की स्थापना के लिए पीठिका स्थित हैं। जिससे संभवित है कि यह सप्तमातृ का मंदिर होगा। मंदिर के दक्षिण, पूर्व और उत्तर के भद्रगवाक्षो में क्रमश: चामुंडा योगेश्वर, शिव और दुर्गाजी के शिल्प है।
यह श्रृंखला का तीसरा मंदिर वर्गाकार गर्भगृह युक्त हैं। मंडोवर के दक्षिण, पूर्व और उत्तर के भद्रगवाक्षो में सप्ताय रथारूढ द्विभुज सूर्य की प्रतिमा हैं। गवाक्ष के सामान्य वर्गाकार स्तंभ के ऊपर चैत्यांकनयुक्त उद्गम हैं। इस मंदिर की द्वार शाख अपने अलंकरण की दृष्टि से विष्णुमंदिर की द्वार शाख के साथ अंशत: साम्य रखती हैं ।
प्राक-सोलंकीकालीन मंदिर के नमूनारूप यह मंदिर समूह का मंदिर में लगभग संपूर्ण स्थिति में सुरक्षित उत्तराभिमुख प्रवेशद्वार के पीछे के दांहनी ओर के कोने में स्थित हैं। तलदर्शन की दृष्टि से मंदिर गर्भगृह और अर्धमंडप का बना हैं। गर्भगृह के आगे का हिस्सा एकदम सुरक्षित समतल भाग से प्रतित होता हैं। पंचरथ तलमान युक्त मंदिर का उर्ध्वदर्शन देखने पर सामान्य भीत पर कर्णपीठ कुंभ, कलश केवाल के उपर सादी जंघा हैं। जिसके शिखर पर ग्रासपट्टी, आंतरपट्टीका और केवाल तथा उपर छाद्य हैं। छाद्यके उपर मध्य की रथिका विविध देव देवी शिल्प से अलंकृत हैं। रथिका के उपर उरुशृंग और कर्ण पर शृगिकाएं हैं। रथिका के उपर उरुशृं, शृंगिका जालक नाम से पहचानी जाती भात से सुशोभित हैं जो नागरशैली का सूचक हैं दोनों ओर दोनों गोल स्तंभिका और उदगम मंडित पूर्व, दक्षिण और पश्चिम के भद्रगवाक्ष में विष्णु प्रतिमा स्थित हैं।
समयांकन: यह मंदिर समूह के समयांकन अंतर्गत अभी तक अनेक विद्वानों ने अपने-अपने अध्ययन निष्कर्ष दिये हैं। जिसके अनुसारमंदिर समूह के शिल्प स्थापत्य की शैली के आधार पर ई.स. की आठवीं सदी से ई.स. की 13वीं सदी तक के समय में स्थापित किये गये हैं फिर भी मूल मंदिर समूह अपनी शिल्प स्थापत्यकला शैली के आधार पर ई.स. की 8-9वीं सदी में रखी जा सके जबकि प्रवेश द्वार के पीछे के हिस्से में स्थित विष्णु मंदिर सोलंकी कला की शुरूआत याने कि ई.स. दसवीं सदी की होनी मानी जा सकती हैं। आगे मौजूदा प्रासाद के बाहर का हिस्सा दक्षिण तरफ मूल मंदिर की जगती, प्रनाल इत्यादि के अवशेष भी मंदिर के अभ्यास समयांकन की महत्व की कडी साबित होते हैं।
 

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